सतर वमरश क सदरभ और नसर शरम क उपनयस
Abstract
एक स्त्री को क्या दुःख है क्या समस्या है और क्या परिस्थिति है एक स्थिति विशेष में इसका सही आकलन करने के लिए साहित्य जगत में स्त्री जितना सक्षम हो सकती है उतना ही पुरुष नहीं। स्त्री अपनी समस्याओं से प्रत्यक्षतः जुड़ी है, उसकी प्रखर अनुभूति उनके ही पास है, वह अपनी पीड़ा का दंश स्वतः भोगती हैं। इसलिए उनकी अभिव्यक्ति में ज्यादा यथार्थ और गांभीर्य समाहित होना स्वाभाविक है। अतएव स्त्री लेखिकाएँ चाहे वो मन्नू भण्डारी, प्रभा खेतान, मृणाल पाण्डे, मृदुला गर्ग हों या चित्रा मुद्गल, गीतांजली, मैत्रोयी पुष्पा अथवा नासिरा शर्मा हों, पुरुष लेखकों के समानांतर न सिर्फ अपनी अभिव्यक्ति दे रही हैं, अपितु साहित्यिक जगत से लेकर समीक्षकों, आलोचकों तक को यह स्वीकार करने के लिए विवश कर रही हैं कि ‘‘महिलाओं का लेखन हिंदी का सबसे सशक्त लेखन है, इसके पीछे पुरुष कथाकारों की दुनिया लगभग पीछे छूट गयी है‘‘ (राजेन्द्र यादव)।
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