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भरतय जञन परपर म मन क सकलपन

International Journal of Advanced Academic Studies · 2023 · Vol. 5(8) · pp. 58–63

Abstract

प्रस्ताविा भारतीय परम्परा में मनोविज्ञान िार्श ननक निन्तन से पृ थक् रूपे ण नई विधा के रूपा में विकनसत नह ं ह ु आ क्योंदक यहााँ की िै ननक दिनियाश के दियाकलापों का विधान इस प्रकार से नननमश त है दक जो प्रातःकालीन िं िना से र्ु रू होकर सं ध्याकालीन िं िना तक माननसक र्ान्न्तप्रिायक है अथाश त ् मनोविज्ञान िार्श ननक निन्तन के अनतररक्त धमश ि लोगों के व्यिहाररक जीिन में व्याप्त था। भारतीय परम्परा में मन की मू लभू त सं कल्पना तथा इसके अध्ययन से मानि जानत के कल्याण हे तु आत्यन्न्तक िु ःखननिृ वि का भी विर्द् विश्ले षण भी प्राप्त होता है साथ ह इस तथ्य का भी स्पष्टतः उल्ले ख है दक मन के विना प्रान्णयों में कोई

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