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परमचद क उपनयस म बल-चरतर: मनवय सवदन क उतकरष
International Journal of Advanced Academic Studies · 2019 · Vol. 1(2) · pp. 196–199
Abstract
कथा-सम्राट प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में जिस प्रकार के बाल-चरित्र की कल्पना की है, वह मानवीय संवेदना से परिपूर्ण हैं इनके बाल-चरित्र कहीं भी दब्बू, कमजोर, कायर या हतदर्प नहीं दिखाई देते हैं। अपने आसपास तमाम सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं से टकराते हुए ये बाल-चरित्र स्वयं अपने व्यक्तित्व का निर्माण करते नजर आते हैं। प्रेमचंद के उपन्यासों में उपस्थित बाल-चरित्र समाज की संवेदना को जागृत करने में अत्यंत सफल है।
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