हनद क वकस और अरथससरग
Abstract
सम्बद्ध रूपों को आधार बनाकर संस्कृत और हिन्दी की जिन विषम चालों की बात कही गई है उनके विषय में यह ज्ञातव्य है कि प्राचीनकाल की भारतीय आर्यभाषाओं में अपनी लम्बी विकास यात्रा के क्रम में अनेक बार अपनी चाल बदली और उसकी चाल में आए बदलाव के कारण ही बोलचाल की वैदिक भाषा लौकिक संस्कृत बनी और लोककण्ठ की संस्कृत भाषा प्राकृत अपभ्रंशो के रूप में अस्तित्त्व में आई अपभ्रंशों तथा आधुनिक आर्यभाषाओं के संक्रमणकाल में आकर फिर उसकी गति बदली जिसे जनपदीय आधार पर विभिन्न आधुनिक आयभाषाएँ अपनी-अपनी जनपदीय विशेषताओं के साथ प्रचलन में आई। हिन्दी सहित विभिन्न आधुनिक आर्यभाषाओं की संस्कृत-मूलकता का इससे बढकर और दूसरा क्या प्रमाण हो सकता है कि ध्वनि भाव प्रकृतियों तथा अन्य भाषायी तत्वों के परिवर्तन की अनेक दशाओं के बावजूद ये भाषाएँ अपने विभिन्न तत्त्वों के व्यवहार में मुख्यतः संस्कृत की दिशा का ही अनुसरण कर रही है।
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