वरतमन परशसनक परसथतय म गध चनतन क परसगकत
Abstract
मानव सभ्यता प्रारम्भ से ही श्रेष्ठ जीवन जीने की आकांक्षी रहा है। इसलिए वह अपने आरम्भिक विकास के समय से ही आग, पहिएएवं धातु जैसी वस्तुओं का अविष्कार कर चुका था। जैसे-ंउचयजैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ विकास के साथ ही प्रशासनिक क्रियाएँ भी शनैः शनैः मजबूत होती गई और प्रशासन के विकास ने सम्पूर्ण समाज के क्रियाकलापों के नियमन का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया। महात्मा गाँधी ने नैतिक और सामाजिक उत्थान को ही अहिंसा का पर्याय माना। उनके अनुसार अहिंसा के पालन से व्यक्ति और समाज का उत्थान सम्भव है। महात्मा गाँधी ने स्वतंत्र राष्ट्र को स्वराज की संज्ञा दी उस स्वराज में प्रत्येक व्यक्ति की योग्यता और प्रतिभा के अनुसार उसको अधिकारएवं शासन प्रणाली में स्थान देने का विचार प्रस्तुत किया। उन्होनंे उसका वर्णन ‘रामराज्य’ शब्द के द्वारा किया है अर्थात् विशुद्ध राजनीति के आधार पर स्थापित तंत्र। विदेशी सŸाा से सम्पूर्ण मुक्ति और साथ ही संपूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता। प्रस्तुत शोध पत्र महात्मा गाँधी के इन्हीं वैचारिक प्रकाश के आलोक में वर्तमान प्रशासनिक परिस्थतियों पर उनकी प्रासंगिकता को प्रस्तुत करने काएक अल्प प्रयास है।
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