रव जल क मधयमक सतर पर परयवरण शकष समबनध शसन क नतय क करयनवयन क समकषतमक अधययन
Abstract
शोधार्थी ने रीवा जिले के माध्यमिक स्तर पर पर्यावरण शिक्षा सम्बन्धी शासन की नीतियों के क्रियान्वयन का समीक्षात्मक अध्ययन किया। 42 वे सविधान संशोधन के पर्यावरण संरक्षण से संबधित राज्य के नीति निर्देशक तत्व के अनुच्छेद 48-क में पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने की बात की गई है। इस प्रावधान के अतिरिक्त अनुच्छेद 51-क के रूप में मूल कर्तव्य के खण्ड (छह) में भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव है, रक्षा करे और उसका संवर्द्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव रखें। संवैधानिक समावेश को क्रियान्वित करने के लिए भारत सरकार द्वारा 1980 में पर्यावरण तथा वन विभाग की स्थापना की गई। पर्यावरण तथा वन विभाग ने प्राकृतिक संतुलन को बनाये रखने के लिए राष्ट्रीय पर्यावरण जानकारी आंदोलन (National Environment Awareness Conference) संगठित किया। यह संगठन पर्यावरण से संबंधित समस्या पर अनुसंधानों को वढ़ाबा देता है तथा पर्यावरण संबंधित जानकारी देने के लिए विद्यालय, महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय स्तर पर विषय के रूप में पर्यावरण शिक्षा को शामिल करने की अनुशंसा करता है। इसके लिए 16-20 दिसम्बर 1982 को नई दिल्ली में अंतराष्ट्रीय पर्यावरण शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसमें 61 धारायें शामिल है और इन्हे 8 अध्यायों में विभाजित किया गया है। भारत में पर्यावरण कानून का इतिहास 125 वर्ष पुराना है। प्रथम कानून सन् 1894 में पास हुआ था, जिसमें वायु प्रदूषण नियंत्रणकारी कानून थे। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण एक जटिल समस्या है तथा वह संपूर्ण विश्व के लिए चुनौती है। आज का बढ़ता हुआ प्रदूषण संपूर्ण मानव-जाति के लिए अभिशाप बन गया है। मानव के अतिरिक्त वन एवं वन्य जीव प्रदूषण से त्रस्त हैं। इसी कारण संविधान में पर्यावरण संरक्षण पर विशेष बल दिया जा रहा है तथा इस समस्या से निपटने के लिए समय-समय पर कई कानून भी बनाए गए हैं।
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