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अनकनतवद और सरवजञनवद

International Journal of Advanced Academic Studies · 2022 · Vol. 4(3) · pp. 168–169

Abstract

जैन दर्शन मे सर्वज्ञानवाद अथवा सर्वज्ञ का ज्ञान एक विशेष महत्व का विषय रहा है, किन्तु जैनेतर दार्शनिकों का मानना है कि सर्वज्ञ नाम की कोई भी वस्तु नहीं है क्योंकि वह न तो दिखाई देती है और न ही उसको तर्क के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है। जैनेतर दार्शनिकों की यह उक्ति युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होती है क्योंकि चाहे कोई भी दर्शन रहा हो, वह किसी न किसी रूप में सर्वज्ञ की सत्ता को स्वीकार करता रहा है।

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