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धरम और वजञन क महतव

International Journal of Advanced Academic Studies · 2022 · Vol. 4(4) · pp. 172–177

Abstract

मानव सभ्यता के विकास की कहानी, धर्म और विज्ञान, इन दोनों के बीच में सभ्यता के विकास की कहानी है। जिस प्रकार से किसी नदी का, यदि एक भी तट टूट जाए तो प्रवाह के अस्तित्व का समाप्त होने का खतरा होता है। प्रवाह निरंतर बना रहे हैं, आगे बढ़ता रहे, इसके लिए आवश्यक होता है कि इसके दोनों तट मजबूतीपूर्वक इस प्रकार से बने रहे कि जिससे प्रवाह का संतुलन बना रहे। नदी अपना मार्ग नहीं बदले, वह अपने लक्ष्य से भटके नहीं। ठीक उसी प्रकार सभ्यता के विकास के लिए धर्म और विज्ञान, इन दोनों तटों का बना रहना बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि इनमें से एक भी तट अपना संतुलन खो बैठे तो विकास का क्रम कब विनाश के क्रम में परिवर्तित हो जाएगा, यह हम मानव जाति से बेहतर कौन जान सकता है? धर्म और विज्ञान दोनों ही केवल मनुष्य के व्यक्तिगत विकास के लिए ही नहीं, अपितु हमारा यह कहना बिल्कुल ही न्यायोचित होगा कि समाज, देश तथा विश्व के कल्याण और प्रगति के पथ पर अग्रसर होने में अपना अलग अलग ही सही लेकिन महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। आज हम जब अपने देश में देखते हैं तो धर्म और विज्ञान के बीच एक द्वन्द्व दिखाई देता है, जो प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्ग हैं, उनके अनुसार विज्ञान यानी प्रगतिशीलता, धर्म यानी पुरानापन। विज्ञान यानि तर्कबुद्धि, धर्म यानी अंधविश्वास। विज्ञान यानि प्रयोगशीलता, धर्म यानि किसी पुस्तक में लिखी हुई बात को ही प्रामाणिक मानना। इसलिए यह धारणा भी प्रचलित हुई है कि विकास करना है तो विज्ञान को अपनाओ धर्म को छोड़ो। इस नाते धर्म और धार्मिक प्रतीकों के लिए एक अजीब सी दृष्टि दिखाई देती है। प्रश्न खड़ा होता है कि कहीं न कहीं धर्म के संबंध में न्यूनता का भाव आधुनिक पढ़े-लिखे प्रगतिशील व्यक्ति के मन के अंदर है। फलतः द्वंद होता है, इस नाते पहले इन तीन प्रश्नों पर विचार करने की आवश्यकता है। पहला प्रश्न है कि धर्म और विज्ञान के बीच में द्वंद का क्या कारण है ? जबकि दोनों विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। दूसरा प्रश्न है कि धर्म और विज्ञान की बीच के द्वंद का मानव जाति पर क्या परिणाम हुआ है, क्या हो रहा है और क्या होगा? और तीसरा यदि परिणाम विपरीत हो रहा है तो इसका उपाय क्या है? जिससे यह द्वंद मिटे।

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