भरतय दरशन म वसतवद अवधरण क एक समकषतमक अधययन
Abstract
वसतवादी अवधारणा वह अवधारणा ह, जो बताती ह कि हमार अनभव दवारा परसतत जगत ही वसततः सत ह तथा जो सत जञय एव अभिधय भी ह। इसक अनसार जगत म जञाता, जञान व जञय तीनो की पथक सतता ह तथा उनम अनभव होन वाला समबनध भी वसततः सत अनय शबदो म विषय और विषयी, धरम और धरमी, अवयव और अवयवी सभी वासतविक सतता ह।विशव की विसतार एव मल सत रप ह अथवा असत रप ह। यह जिजञासा भी दारशनिको क चिनता का विषय रही ह। एक समान दषटिगोचर होन वाल जगत क बार म चिनतो क विचार भद रहा ह। पाशचातय दषटिकोण म वसतवाद परतयवाद क विरोध क सदरभ म आया।यरथाथवाद की वासतविकता को समझन और भावनाओ स परभावित न होन वाला आचरण को वसतवाद कहत ह। (Oxford Dictionary) पाशचातय सदरभ म-गरीक दरशन क परमिनाइडीज न वसतवाद की अपनाया जिसक अनसार जञान क विषय की वासताविक सतता होती ह, पलटो न इस सिदधानत का विकास करक सवादिता सिदधानत का निरमाण किया जिसक अनसार वासतविक जञान वह ह जिसक अनरप वासतविक सतता की विदयमान ह। मर व रसल इतयादि वसतवादी दारशनिक ह।
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