तलसदस क रचनओ म छनद और सगत
Abstract
गोसवामी तलसी दास वालमीकि, वयास, कालिदास, होमर, शकसपय आदि क अतर क विषवकवि ह इनक परतयक रचना म छनद और सगीतातमकता का विषष धयान रखा गया ह। मकतक कावय की सगीतातमकता आतमामिवयजना, भावनविति, सहज अनतः पररणा शलीगत सवभाविकता, भाषा की सकमारता आदि ततवो का समावष कर तलसीदास कावय की आतमा का उतकरष भी किया ह और शरीर का शगार भी। रामचरित मानस क ससकत शलोक को छोड़कर शष सपरण महाकावय म दोहा-चपाई और सोरठा म ही रचना की गई ह, यदयपि भावधारा और परसग क अनसार लय-गति-ताल का अनषरण करत हए हरिगीतिका आदि छदो क उपयोग क अनक उदाहरण मिलत ह। गोसवामी की अनय परमख कतियो म कवितावली और हनमान बाहकर क परिय छद कवितव और सवया ह। ‘‘रामाजा परषन’’ और ‘दोहावली’ म दोहा छनद ‘‘पारवती मगल’’ और जानकी मगला सोहर और हरिगीतिका छनद का उपयोग दिखाई दता ह। विनय पतरिका गीतावली और ‘‘कषण गीतावली’’ म परगीत और मकतक क रचनाततर का परयोग ह। पद शली म रचित य परगति और मकतक कलयाण, गौरी, असावरी, भरवी, कदारी धनाशरी, मलहार, रामकली, होड़ी, मार, विलाव आदि राग रागनियो म निबदध ह। सवामी हरिदास की सगीत परमपरा स रस-सिकत गायन शली का लाभ उठात हए और बरजभाषा की मजी हई परगीतातमकता का निखार परसतत करत हए तलसीदास न सगीत क परति भी अपनी गहरी अभिरचि और रागमयता का परिचय दिया ह।
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