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तलसदसज कत ‘दहवल’ क कलतमक वषषटय

International journal of applied research · 2018 · Vol. 4(1) · pp. 524–526

Abstract

तलसीदास मखयतः एक भकत थ इसलिए उनहोन न तो परतयकष रप स कावय का शासतरीय विवचन-विषलषण किया और न कवि क रप को अपनी रचनाओ म परमखता दी। ‘मानस’ म तो उनहोन घोषणा ही कर दी ह-‘‘कवित विवक एक नहि मोर’’ तथा ‘‘कवि न होऊ नहि चातर कहाबह’’ यहा उनहोन सपषट कर दिया ह कि ‘कावय-विवक’ और ‘कावय-चातरी स उनकी कविता भिनन ह। राम की यषोगाथा गात हए तलसीदासजी न परसगवष कावयादरषो का निराकरण किया ह। गोसवामीजी न कावय म भावाभिवयकति क समान ही कला-पकष को भी महतव परदान किया ह। पर यह सपषट ह कि उनहोन कावय-रचना म कला-पकष को जानबझ कर महतव नही दिया, अपित यह अनायास ही निःशरित होता चला गया।तलसीदास एक समनवयवादी कवि थ। उनहोन जिस परकार भकति धरम, दरषन और समपरदायिक मानयताओ क कषतर म समनवय सथापित किया, उसी परकार उनहोन कावय म भाव-पकष एव कला-पकष क सनदर समनवय दवारा कावय-रचना को शरषठ आदरष परसतत किया।किसी भी रचना क अभिवयकति-पकष स सबधित जिन विषषताओ की चरचा की जाती ह, उनह समगररप म अभिवयकति-पकष या षिलप-पकष या कला-पकष की सजञा दी जाती ह। कला-पकष क अनतरगत मखयतः वरणन शली, अलकार, गण, दोष छनद भाषा आदि पर विचार किया जाता ह। डा0 उदयमान सिह कहत ह-‘‘परति पादय बसत की आननद विदयाचिनी-विदयायिनी अभिवयजना-षली कला ह। विभाव आदि का उचित सयोजन, वयवसथित वसत-विनयास धवनि-वकरोनति, गण-वति, अलकार, चितरातमकता उपरयकत छनद आदि कला-पकष की विषषताए ह।’’

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