छठ शतबद ई॰प॰ म वयपर-वणजयक क परदय
Abstract
छठी शताबदी भारत क इतिहास म एक निरणायक कालखड था। भारत म परबल नगरीकरण क दवितीय अधयाय ही शरआत इसी काल म हई। वदिक काल म जो सभयता का परखर सरयोदय हआ, वह वदिक धरम इस समय तक आकर तरह-तरह की वयाधियो एव पाखडो स घिर गया। वदिक धरम की वरजनाओ क कारण दश की सामाजिक आरथिक एव राजनीतिक परणाली मानो कद सी पड़ गयी थी। लोग सासत का अनभव करन लग थ। बराहमणवाद अपन चरम पर पहच चका था। बनधन क इस यग म अदर ही अदर चनौती क सवर उभरन लग थ एव परोहितो क कारण बोझ स लगनवाल करमकाडो क विरोध म अनक बौदधिक-धारमिक मत एव मतवाद उभरन लग थ। वरदधमान महावीर एव गौतम बदध क सवर इनम सबस परबल होकर उभर जिनहोन वद की सतता को खली चनौती दत हए लोगो क समकष एक नवीन धरम उपसथित किया। जन एव बौदध धरम क मधयम मारग तथा नवीन आरथिक चितन न लोगो को खासा परभावित किया। फलतः वदिक धरम क बोझ तल दब लोगो न इन दोनो धरमो को अपनाना शर किया एव नय जोश-खरोस क साथ उदयोग एव वयापार म लग गय। इसका परिणाम यह निकला कि उदयोग एव वाणिजय-वयापार न आशातीत सफलता परापत की। लोगो की आरथिक समदधिया बढ़ी। इस नवीन आरथिक परिवश म नगरो की नयी परिभाषा गढ़ी। नगर जो पहल कवल सीमित गतिविधियो न कनदर थ व अब परबल आरथिक गतिविधियो क भी कनदर बन गय। मखय नगरो क अगल-बगल वयवसायियो एव कारीगरो की उपनगरीय बसतिया बसन लगी। जो परपरागत नगर थ उनकी भवयता म चार चाद लगन लग।
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