वदक कल म उदयग, शलप तथ वयपर एव वणजय क सथत
Abstract
वदिक काल क आरभिक चरणो म लोगो को जो सवततरताए थी अब उनपर कठाराघात होन लगा था जिसका परभाव समाज वयवसथा पर पड़ रहा था। इसक कारण अरथ वयवसथा भी परभावित हो रही थी। परव क यगो म वयापारी उनमकत होकर सामदरिक वयापार किया करत थ। लकिन सतरकारो न समदर यातरा को निषिदध कर दिया। बौधायन सतर म कहा गया कि शासतरासतर एव ऊन का वयापार तथा समदर यातरा निदित करम ह। समदर यातरा करन स मनषय पतित हो जाता ह। इसस यह परतीत होता ह कि सतरकाल म आकर सामहिक वयापार निषिदध माना जान लगा था और विदशी वयापार बहत ही सीमित हो चला था। जाहिर ह कि इस तरह की जटिलताओ एव वरजनाओ क कारण शिलपी एव वयापारी वरग परभावित होन लग जिसका परभाव उदयोग एव वयापार पर पड़न क साथ-साथ नगरीकरण पर भी पड़ा होगा। निशचित रप स वदिक काल का अतिम चरण उदयोग, वयवसाय एव नगरीकरण क लिय सवसथपरद नही रह गया था।
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