ववहकल नरपण
Abstract
भारतीय वदिक सनातन परमपरानसार ससकारो म विदयाधययन क पशचात परमख रप स ‘विवाह‘ ससकार आता ह, जिस ‘पाणिगरहण ससकार‘ भी कहत ह। गहसथ आशरम म परवश का मारग इसी ससकार स आरमभ होता ह। माता-पिता क पशचात वयकति का निकटतम समबनध पतनी क साथ रहता ह। इस समबनध का परभाव कवल मनषयो क जीवन तक नही अपित उसक वश की आगामी कई पीढ़ियो तक चलता ह, कयोकि सनतान परमपरा म परवजो क गण-दोष किसी न किसी रप म विदयमान रहत ह।समावरतन ससकार क अननतर परष क विवाह क लिए अवशय परयतन करना चाहिए। वदिक नितयकरम, बिना पतनी क नही हो सकत। अतः जीवन का साथी, परष की सहचारिणी सतरी एव सतरी का सहचारी परष दोनो सतरी परषो क सममिशरण ऐहिक और परलौकिक (अदषट ) अभयदय क लिए गहसथ आशरम सरवशरषठ आशरम ह। गहसथाशरम स ही बरहमचरय, वानपरसथ और सनयास जस उचच आशरमो को परशरय मिलता ह। पति क अनकल शील सवभाव स यकत भारया धरम, अरथ, काम और मोकष की कारण होती ह।समसत ससकारो म ‘विवाह ससकार‘ का महतवपरण सथान ह, अधिकाश गहयसतरो का आरमभ विवाह ससकार स होता ह। ऋगवद तथा अथरववद म ववाहिक विधि-विधानो की कावयातमक अभिवयकति मिलती ह, उपनिषदो क यग म आशरम चतषटय का सिदधानत परी तरह स परतिषठित हो चका था, जिनम गहसथाशरम को सरवाधिक महतव दिया गया था। आज भी गहसथाशरम का महतव उसी परकार ह। गहसथाशरम की आधारशिला ‘विवाह ससकार‘ ही ह, कयोकि इसी ससकार क अवसर पर वर-वध अपन नवीन जीवन क महान उततरदायितव का निरवहन करन की परतिजञा करत ह।
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