भरत म सथनय सवयतत शसन एव समहक वकस क अवधरण एक वशलषणतमक अधययन
Abstract
भारत म पचायतीराज की अवधारणा बहत पराचीन ह। यहा पराचीन ससथाओ स समबनधित अवधारणा को ही परिवरतित सवरप म परसतत किया गया ह। ‘‘पचायतीराज’’ शबद का असतितव सवतनतर भारत म शरी बलवनतराय गोपाल जी महता क ‘‘लोकतातरिक विकनदरीकरण’ परतिवदन स उदय हआ, शाबदिक दषटि स पचायतीराज शबद हिनदी भाषा क दो शबदो ‘‘पचायत’’ और ‘‘राज’’ स मिलकर बना ह जिसका सयकत अरथ होता ह पाच जनपरतिनिधियो का शासन। भारत क पराचीन साहितयिक गरनथो म भी पचायत अथवा ‘‘पचायती’’ शबद ससकत भाषा क ‘‘पचायतन’’ शबद स उदभत हआ ह। ससकत भाषा गरनथो क अनसार किसी आधयातमिक परष सहित पाच परषो क समह अथवा वरग को पचायतन क नाम स सबोधित किया जाता था। परनत शनः शनः पचायत की इस आधयातमिकतायकत अवधारणा म परिवरतन होता गया और वरतमान म पचायत की अवधारणा का अभिपराय इस परकार की निरवाचित सभा स ह जिसकी सदसय सखया परधान सहित पाच होती ह और जो सथानीय सतर क विवादो को हल करान म महतवपरण भमिका निभाती ह। गाधी जी न भी पचायत शबद की वयखया करत हए लिखा ह कि, ‘‘पचायत’’ शबद का शाबदिक अरथ गराम निवासियो दवारा चयनित पाच जनपरतिनिधियो की सभा स ह।
How this paper connects to the literature. Drag to explore, click any node to open that paper.
