सरदस क सहतय क समजशसतरय अधययन
Abstract
साहितय अगर समाज का दरपण ह तो साहितयकार उस दरपण का निरमाता जिसम हम ततकालीन समाज क परतिबिब को दख सकत ह । हालाकि यहा साहितयकार का मखय उददशय समाज.दरशन का दरपण तयार करना नही होता कित सामाजिक पराणी और भाषिक पश होन क कारण वह अनायास ही कछ ऐसा सजन कर दता ह जो ततकालीन समाज और ससकति क अपरमाणित दसतावज हो जात ह । भाषाए समाज और ससकति क साथ घनिषठ सबध होन क कारण लाख सावधानी बरतन क बावजद कोई साहितयकार अपन साहितय म ततकालीन समाज का परतिबिब उकरन स नही बच सकता। यही कारण ह कि कषण.भकति शाखा क परतिनिधि कवि सरदास का साहितयए भकति साहितय क साथ.साथ अपन समय का सामाजिक दसतावज भी माना जा सकता ह । सरदास न भकति क साथ.साथ अपन साहितय म ततकालीन समाज की ससकति एव सामाजिक वयवसथा दोनो का विसतत वरणन किया ह । उनका साहितय परमए भकति और वातसलय का सगम ही नही समाज एव ससकति का दोआब भी ह ।
How this paper connects to the literature. Drag to explore, click any node to open that paper.
