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परपरक मठय वसतर क बनई एव ससकतक महतव: सरगज जल क वशष सदरभ म

International Journal of Multidisciplinary Trends · 2021 · Vol. 3(1) · pp. 18–21

Abstract

सवाधीनता आदोलन क समय महातमा गाधी जी न सवदशी वसतओ क परयोग पर जोर दिया, दशवासियो को खादी पहनन को पररित किया अतः घर-घर चरखा चलन लगा, लोगो म सवावलमन की चतना का विकास हआ और कटीर उदयोग चलन लग | मोठिया साडी म लाल रग क धाग स पाड या किनारा और आचल को कलातमक बनाया जाता ह, इस साडी की लमबाई बारह और चौदह हाथ होती ह, पहल महिलाए बडी की जगह साडी को ही लपटती थी इसलिए साडी लबी ही बनी जाती थी, इस ‘चौदहा’ कहा जाता था | पहल गरामीण कषतरो म हथकरघ स बन वसतरो का ही चलन था, वहा खत-खलिहान, जगल और नदियो तक उनक काम बिखर होत थ, उन कामो को करत हए य मोट वसतर गरमी हो या बरसात उनह सहलियत ही दत थ | महिलाए उन मोठिया साडियो को एडी तक नही, घटन तक ही लपटती थी और आचल का हिससा शरीर क ऊपरी हिसस को ढकता था | खतो म काम करना हो, नदी या तालाब स मछलिया पकडना हो या तो जगल स लकडिया, फल-फल, कदमल एकतर करना हो, घटन तक पहनी गई साडी स उनह बडी सहलियत होती थी |

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