Scinovex
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पञचकरम चकतस क मलभत सदधनत

International journal of applied research · 2021 · Vol. 7(2) · pp. 139–141

Abstract

रोगोतपतति वदधिगत दोषो स होना सरव सवीकार तथय ह। इसी सथापित तथय क कारण ही वागभट न शरोगसतदोष वषमयम कह कर सकषप म रोगो को परिभाषित किया ह। किनत यदि समयक विचार कर तो वदध दोष-सचित, परकपित होकर जब विभिनन सतरोतसो म परिभरमण करत हए किसी सतरोतस म सथान सशरयित होकर शदोष-दषय-समपरछनाष एव सतरोतोदषटि कर रोगोतपतति करता ह, तभी रोग की सजञा परापत होती ह। पञचकरम चिकितसा मखयतः दोषपरक ह। वदधदोष को सामयावसथा म लान क दो उपाय सभव ह। 1. दोष सशमन 2. दोष निरहरण। दोष निरहरण की उतकषटता इस कारण स ह कि इसस रोगोतपतति क मल कारण दोषो का मलचछदन हो जाता ह। जिसस रोग परतिकार अपनरभव परकार का होता ह। यही भाव पञचकरम का मखय लकषय ह। इसक अतिरिकत पञचकरम, धातपोषण, अगनिवयापार, सतरोतस आदि पर परभाव डालकर कालजनय दोष सचयादिक अवसथाओ म तथा षटकरिया काल की परारमभिक अवसथाओ म समचित रप स करन स रोगपरतिषध (सवसथसय सवासथयरकषणम) भी करत ह।

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