जगदश चनदर मथर क नटक म चरतर-सषट
Abstract
जगदीशचनदर माथर की चरितर-सषटि का आधार यथारथ ह। यथारथ इसलिए कि उनहोन अपन पातरो क लिए जो नाटय-ससार निरमित किया ह वह सरवथा उसक अनरप ह। उनक नाटको का मनोमय जगत इतिहास, जनशरति, मिथक और कलपना पर आधारित हय उसक अनरप ही उनक पातर एक परकार की वसतगत और भावगत विशवसनीयता को उजागर करत ह। ऐतिहासिक नाटको की धारा म समभवतः कोणारक मोड़ का पहला महततवपरण बिनद था, जिसम इतिहास का यथारथ-बोध झलकता ह। उसी परमपरा म शारदीया म रोमानी वातावरण इनदरधनष की भाति लहराता दिखाई दता ह, किनत उसक पातर यथारथ जीवन क सनदर और असनदर, नतिक और अनतिक, सत और असत क तीख-मीठ चट पीत ह और समची निरमम वासतविकता म जीवन क मल सवर को वाणी दत ह। जहा तक पहला राजा का परशन ह, यह कहना अनचित न होगा कि ऊपर स अयथारथ लगनवाली यह कति मल मानवीय यथारथ का कही अधिक परामाणिक उदघाटन करती ह, किनत माथर का यथारथ एक ऐसी निरमित और सरजनागराही मनःसथिति का यथारथ ह, जिसम अयथारथ भी यथारथ जसी विशवसनीयता परापत कर लता ह। माथर क नाटकीय पातर परसाद की भाति एकदम आदरश स उदभत नही ह। व कलपना क योग स अवशय रच गए ह, पर व यथारथ की भावभमि पर यग क परिवश म उतार गए ह। इसलिए उनम इतिहास और मिथक भी ह और समकालीन मानव का अनतरबाहय जीवन भी परचछनन रप स अनतरनिहित ह।
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