परसदततर हनद नटक क वषय और शलप
Abstract
नाटक-जयशकर परसाद क बाद हिनदी नाटक विषय-वसत और शिलप की दषटि स और अधिक समदध हए। विषयगत वविधय की दषटि स पौराणिक, ऐतिहासिक, सासकतिक, सामाजिक, राजनीतिक और समसयापरधान नाटको का सजन हआ। यहा तक आत-आत पौराणिक नाटको की लोकपरियता म कमी आन लगी थी इसलिए इनकी सखया म कमी भी आई। फिर भी कछ नाटको न अपनी अभीषट छाप छोड़ी। इस यग क पौराणिक नाटको म उदयशकर भटट कत ‘अमबा’ और ‘सागर विजय’, सठ गोविनद दास कत ‘कतरतवय’, चतरसन शासतरी कत ‘मघनाद’, हरिकषण ‘परमी’ कत ‘पाताल-विजय’, पाणडय बचन शरमा ‘उगर’ कत ‘गगा का बटा’, कलाशनाथ भटनागर कत ‘भीमपरतिजञा’ और शरीवतस तथा दवराज कत ‘रावण’ उललखनीय ह। इन नाटको की विशषता यह ह कि इनम आधनिकता का भी समावश किया गया ह। ‘अमबा’ का कथानक पौराणिक होत हए भी आधनिक नारी समसया को परसतत करता ह। सठ गोविनददास क ‘करण’ म जाति-पाति की समसया को उठाया गया ह। कहन का तातपरय यह ह कि इन पौराणिक नाटको म वरतमान जीवन की उन समसयाओ को परसतत किया गया ह जो हमार समाज क लिए गरहित ह। इसक लिए वयगयातमक शली अपनाई गई ह ताकि समाज क अधविशवासो एव रढ़ियो पर परहार किया जा सक और मानव जीवन क बहततर मलयो को सगमतापरवक सथापित किया जा सक।
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