ब० एड० एव ब० प० एड० छतर क शकषक व समजक समयजन क तलनतमक अधययन
Abstract
अनकलन की कषमता ही जीवो को विशष परिसथितियो म जीवित रखती ह। परिवश क मताबिक कछ ऐस गण विकसित हो जात ह, जिनक दवारा वह उस परिवश म आसानी स समायोजित हो जाता ह। समायोजन एक सकषम अवधारणा न होकर, एक वयापक अवधारणा ह, जिनम भौतिक विशषताओ क साथ-साथ आतरिक विशषताए भी अतरनिहित होती ह, जो वयकति क रहन, दसरो स अतकरिया आदि को बहद सकषमता स परभावित करती ह। समायोजन जीवन परयत चलन वाली एक परकरिया ह, जो वयकति को वातावरण की विभिनन आवशयकताओ की परति और उनक साथ तालमल सथापित करन म मदद करती ह। एक सामाजिक पराणी क रप म हम समाज म रहत ह और समाज क दसर सदसयो स अपनी पहचान बनान और समाज क मानको क अनसार वयवहार करन की कोशिस करत ह, जिसस हम दसरो क साथ समायोजन करन म सकषम हो सक। परतयक वयकति किसी न किसी समाज का नागरिक या सदसय होता ह और उसक विकास स उस समाज का विकास होता ह, अतः परतयक समाज अपन नागरिको क वयकतिगत जीवन क बहमखी विकास की वयवसथा शिकषा क माधयम स करता ह। अतः परिवार, समाज, विदयालय को एक नया आयाम परदान करन क लिए यह अधययन अपना महतवपरण योगदान द सकता ह।
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