आधनक सहतय म ससकत क सवर
Abstract
आधनिक साहितय म भावो की विविधता ह। इसम एक ओर परम और ससकति की झलक ह तो दसरी ओर घटन, अकलापन और सतरास ह। भारतनद यग स अब तक लिख जान वाल भारतीय साहितय म भारतीय ससकति क सवर अतयधिक मखरित हए ह। इसस परव भी वशविक पटल पर हमारी ससकति को खब सराहा गया ह। यह ससकति अनक झझावतो स थपड खाकर भी अकषणण रही ह कयोकि इसक अपन सिदधात, विचार तथा मलय ह। इसका सबस परवल पकष अधयातम ह जिस ऋशि-मनियो, विचारको एव साहितयकारो न सदव पशट किया ह। भारतनद, दविवदी, परसाद, परमचद यगीन साहितयकारो न ससकति क विविध सवरो का चितरण किया ह। इस सबध म भारतनद का निबध ‘वशणवता और भारतवरश’ सरदार परणसिह का ‘आचरण की सभयता’ जयशकर परसाद और परमचद का अधिकाश साहितय, रामधारी सिह दिनकर का ‘ससकति क चार अधयाय’ आदि उललखनीय ह। वरतमान म रामदरश मिशर, मिथलशवर, असगर वजाहत, हिमाश जोशी, भरत शरमा ‘भारत’, सशील मोहिनी वरमा, गोपाल बाब शरमा, विकरमसिह, राजसथान पतरिका समह क परधान सपादक गलाब कोठारी आदि उललखनीय साहितयकार ह जो कमोवश ससकति की रकषा हत साहितस सजन कर रह ह। यह सपशट ह कि हमारी ससकति आज भी विशव की ससकतियो स शरशठ ह।
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