परव मधयकलन भरत म सथपतय एव मरततकल — एक समकषतमक वशलषण
Abstract
परव मधययग म कला और सथापतय क कषतर म अतयत महततवपरण विकास हए। कषमीर, राजसथान तथा ओडिषा सहित अनय कषतरो म सथापतय और मरतिकला की विषिषट कषतरीय शलिया विकसित हई। परायदविपीय भारत म राषटरकट, पषचिमी चालकय, पललव, होयसल तथा चोलो क सरकषण म विषाल सतर पर निरमाण कारय दखा गया। परव की शताबदियो स भिनन, जब अधिकाष सथापतय समबधी अवषषो की परकति बौदध थी, इस काल म हिद मदिरो का निरमाण कारय कही अधिक महततवपरण हो गया। षिलपषासतरो (वासत और सथापतय पर लिख गरथ) की परयापत सरचना परव मधय यग म की गई ह। (पराचीन तथा परव मधययगीन सरचनाओ म विषषकर परतोलि, गोपर तथा तोरण क सदरभ म, शासतर और परयोग क बीच वासतविक समबध को ढढन का परयास किया गया ह, इनम तीन मखय मदिरो म सथापतय शलियो का वरणन मिलता ह - नागर, दरविड़ तथा वसर। हिमालय स विनधय क बीच की भमि नागर शली की ह कषण तथा कावरी नदियो क बीच की भमि दरविड़ शली की उतकरष भमि ह, जबकि बसर शली का कषतर विनधय स कषणा नदी क बीच का ह। मदिर शलियो का अधययन ततकालीन मदिरो क विदयमानो अवषषो क अधययन दवारा किया जा सकता ह।
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