परसद क नटक म सतर-वमरश क उभरत सवरप
Abstract
धरवसवामिनी’ नाटक म सतरी-असमिता का उभरता हआ सवरप बहत सपषट रप स दिखाई पड़ता ह। धरवसवामिनी एक ऐसी सतरी ह जो तथाकथित सतरी-सलभ आवरण को उठा फकती ह और सभाषण क आरमभ स ही उसक भीतर ओज और आधनिक सतरियोचित वग दिखाई दता ह। चाह पति रामगपत हो, चाह शिखर सवामी हो या राजदरबार का अनय कोई सदसय। सभी क साथ वह तरकपरण ढग स निरभीकतापरवक सवाद कर सबको निरततर करती ह। रामगपत स परथम बार मिलत समय ही वह कहती ह- ‘इस परथम सभाषण क लिए म कतजञ हई महाराज! किनत म भी यह जानना चाहती ह कि गपत सामराजय कया सतरी समपरदान स ही बढ़ा ह?’ इसक बाद शिखर सवामी स वह कहती ह- ‘यह तो हई राजा की वयवसथा, अब सन मतरी महोदय कया कहत ह।” इतना ही नही परषसतताशील समाज को चनौती दत हए और उभरत हए सतरी असमिता का एहसास करत हए वह कहती ह- ‘कछ नही, म कवल यही कहना चाहती ह कि परषो न सतरियो को अपनी पश-समपतति समझ कर उन पर अतयाचार करन का अभयास बना लिया ह, वह मर साथ नही चल सकता। यदि तम मरी रकषा नही कर सकत, अपन कल की मरयादा, नारी का गौरव नही बचा सकत, तो मझ बच भी नही सकत हो। हा, तम लोगो को आपतति स बचान क लिए म सवय स चली जाऊगी।’
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