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परसद क नटक म सतर-पतर क समजक परवश और सघरष

International journal of applied research · 2019 · Vol. 5(5) · pp. 280–281

Abstract

परसाद क नाटको म सतरिया अनक रपो म हमार सामन दिखाई दती ह। अब बात आती ह परिवश और सघरष की। परिवश वह चीज ह जिसम रह कर मनषय जीवन-यापन करत ह और वह मनषय क कारय, आचरण और वयवहार को परभावित भी करता ह। परिवश को शबदारथ-विचार कोश म इस परकार परिभाषित किया गया ह-‘परिवश का पहला अरथ ह -घरा या परिधि और दसरा अरथ ह- वह आभा-मणडल या परभा-मणडल जो उजजवल पदारथो क चारो ओर और बड़-बड़ महापरषो क मख-मणडल क चारा ओर या तो दिखायी दता ह या कलपित कर लिया जाता ह, परनत परसतत परसग म इसका अरथ होता ह-आस-पास की व अवसथाए आदि जिनका मनषय क कारयो और वयवहारो पर परिचालक परभाव होता ह। इसम आरथिक, नतिक, सासकतिक और सामाजिक सथितियो का भी अनतरभाव माना जाता ह, जसः जिस दहाती परिवश म उनकी बालयावसथा और यवावसथा बीती थी, उसम उनक लिए किसी परकार का औदयोगिक, वजञानिक या शकषणिक उननति क लिए कोई अवकाश नही था।। अरथात व वहा रहकर अचछी या विशष उननति नही कर सकत थ। जीव-जनतओ, वनसपतियो आदि क परसग म इस शबद क अनतरगत उन जलाशयो, परवतो, वनो आदि का भी अनतरभाव हो जाता ह जिनक आस-पास या बीच म रहकर व जीवन बितात या विचरण करत ह।‘

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