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रण क कहनय म सतर वदन क यथरथ दरशन
International journal of applied research · 2017 · Vol. 3(3) · pp. 247–248
Abstract
रण न गरामीण-जीवन की वासतविकता को परत-दर-परत खोल कर पाठक क सामन रखा ह। यथारथ को वयकत करन म उनहोन समाज म घटित होनवाली घटनाओ को बिब क रप म दिखान का परयास किया ह। रण का मन ठीक इस सवदिया की तरह ह। वह सवाद को ठीक-ठीक कह नही पाता ह। वह अपन गाव की दखदायी गाथा को कहत हए रोता ह, बिलखता ह।
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