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समजक-ससकतक और रषटरय सदरभ म छयवद

International journal of applied research · 2016 · Vol. 2(1) · pp. 198–200

Abstract

छायावाद परोकष जीवन की नही, परतयकष जीवन की ही अनभति ह। इसम वायवीयता क धरातल पर मासलता की अभिवयकति ह। यह कलपना दवारा उतपादित जीवन-चितरो की सरल कावय-धारा ह और सरस कावय परतयकष ससार स मह मोड़कर नही लिखा जा सकता ह। वह लाकषणिक शली मातर भी नही ह। वरन छायावाद अगम अगोचर, अनाम, अवयकत, अजञात, अतित तथयो का पज ह, जिसम कवियो न अपनी मन की बात को अभिवयकत किया ह। छायावादी कवियो न सकषम सकतातमक परतीक योजना म निबदध अभिवयजना की विभिनन भगिमाओ को सवदना क समपट म परसतत किया ह। उनका सवर सामाजिक, सासकतिक, राषटरीय, मानवतावादी आदि का समयक परतिफल ह। व मकति चाहत ह- ‘‘एक ओर कवि की रढ़ियो स, दसरी ओर सामाजिक एव राषटरीय पराधीनता क बधनो स।’’

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