भरत म वयपत समजक असमनत: एक वशलषणतमक अधययन
Abstract
भारत म जनम और यही पल-बढ़ लोग जानत ह कि सामाजिक असमानता जीवन की वासतविकता ह। हम गलियो म रलव पलटफारम पर भिखारियो को दखत ह। हम छोट-छोट बचचो को घरल नौकर भवन निरमाण कारय करत हए, सड़को क किनार बन छोट बचचो को जो कि नगरीय मधय वरग क घरो म घरल नौकर क रप म काम करत ह, अपन बड़ बचचो का सकल बसता ढोत ह और कछ इसका सामना करत ह। इसी परकार महिलाओ क खिलाफ हिसा एव अलपसखयक समहो तथा अनयथा सकषम लोगो क बार परवागरह की खबर भी हम रोजाना पढ़त ह। सामाजिक असमानता का यह रोजमररापन इनका इस परकार रोजाना घटित होना इनह सवाभाविक बना दता ह हम लगन लगता ह कि यह एकदम सामानय बात ह। य कदरती चीज ह जिनह बदला नही जा सकता। अगर हम असमानता को कभी-कभी अपरिहारय नही भी मानत ह तो अकसर उचित या नयायसगत भी मानत ह। षायद लोग गरीब अथवा वचित इसलिए होत ह कयोकि उनम या तो योगयता नही होती या व अपनी सथिति को सधारन क लिए परयापत परिशरम नही करत। एसा मानकर हम उनह ही उनकी परिसथितियो क लिए दोषी ठहरात ह। यदि व अधिक परिशरम करत या बदधिमान होत तो वहा नही होत जहो व आज ह।
How this paper connects to the literature. Drag to explore, click any node to open that paper.
