जगल क दवदर’ क नयक बरस मणड
Abstract
आदिवासी जीवन पर रच गए भारतीय उपनयासो म ‘बलि-विभावरी’-शिरसकर (मराठी), ‘कडियर कस’-कारत (कननड़), ‘अमत सतान’-गोपीनाथ महती (उड़िया), ‘मधओर’-शिवशकर पिलल (मलयालम), ‘कब तक पकार’-रागय राघव, ‘मला आचल’-रण,, ‘सिदध कानह, ‘चोटटी मडा का तीर’, ‘हजार चरासी की मा’- महाशवता दवी (बगाली), ‘अरणयवहनि’-ताराशकर बधोपाधयाय (बगाली), ‘आरणयक’-विभति भषण बधोपाधयाय (बगाली), ‘गगन घटा घहरानी’ (मनमोहन पाठक), ‘सहराना’ (पननी सिह), ‘अलमा कबतरी’ (मतरयी पषपा), ‘जगल जहा शर होता ह’ (सजीव) आदि महतवपरण ह। इनम बगाली लखिका महाशवता दवी दवारा रचित उपनयास ‘जगल क दावदार’ एक माइल सटोन मील का पतथर सिदध हआ ह। इसम चितरित सथाल आदिवासी नता बीरसा मडा न अगरजो क सामन अपन अधिकारो क लिए सघरष किया था। जिसस भयभीत हो अगरजो न इस जहर दकर मार डाला था। बीरसा मर कर भी मडा म चतना और अधिकार-बोध भरकर उनह अनयाय क विरदध सघरष करना सिखा जाता ह। इस बीरसा क परभाव स गडाधर जस नता हए। तो बिहार, झारखड, उड़ीसा, छततीसगढ और मधयपरदश क परवी-दकषिण कषतर क आदिवासी उस अपन नायक क रप म दखत ह।
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