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परसद क कवय: जवन दषट और सवरप

International journal of applied research · 2016 · Vol. 2(11) · pp. 89–93

Abstract

सौनदरय की समगर अनभति क कषतर म चिनतन और भावनागत जो भी उतकषटतम तातविक सफरतिया मानव को आज तक उपलबध हई ह, परायः व सब ‘परसाद’ क अनभव पथ म आ चकी ह और उनक साहितय म निरपति की जा चकी ह, और इसी म ‘परसाद’ की सौनदरयानभति की परणता निहित ह। परसाद मलतः यग सषटा साहितयकार थ। कवल परतयभिजञा दरशन की उदभावना, उनका लकषय नही था। पनरतथान यग क समगर नवीन दरशनो और भारतीय अदवत भावना क साथ यग मानव का परण विकास ही उनका परतिपादय रहा। लोकजीवन क परागण म इहलोक क अनकल जड़ दरशन और आतमा क परण परिषकरण क लिए अदवत दरशन क समनवय म ही परसाद की दारशनिक चतना का आलोक मिलता ह। परसाद की जीवन दषटि क अनसार छायावाद की नवीन अभिवयकति भगिमा पराचीन काल म भी समदध रप म विदयमान रही ह। उसक आतम सपरश की अनमति क साथ-साथ अनतर दरशन वयजना का सौनदरय भी दषटवय ह। इनही मानयताओ स छायावाद काल म जयशकर परसाद की साहितयिक जीवन दषटि सबस अधिक पषट हई। शरगार परवणता क अनतरगत परकति क परतीको दवारा नारी क अतीनदरिय सौनदरय की वरणन वाली चतना परसाद कावय म लकषित होती ह।

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